ट्रंप ने रूस और ईरान पर कड़े प्रतिबंध वाले कानून को दी मंजूरी, भारत पर 100 प्रतिशत टैरिफ का खतरा

राष्ट्रपति ट्रंप ने सैंक्शनिंग रशिया एंड ईरान एक्ट 2026 पर हस्ताक्षर किए, जिससे भारत और चीन जैसे रूसी तेल खरीदारों पर 100 प्रतिशत टैरिफ लग सकता है।

Sep 19, 2026 - 09:35
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ट्रंप ने रूस और ईरान पर कड़े प्रतिबंध वाले कानून को दी मंजूरी, भारत पर 100 प्रतिशत टैरिफ का खतरा

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने आधिकारिक तौर पर सैंक्शनिंग रशिया एंड ईरान एक्ट ऑफ 2026 को मंजूरी दे दी है, जिससे यह अब एक कानून बन गया है। इस कानून पर हस्ताक्षर के साथ ही अमेरिका ने रूस और ईरान के खिलाफ अपने आर्थिक युद्ध को एक नए स्तर पर पहुंचा दिया है। आर. 5334, जिसे लिंडसे ओ ग्राहम सैंक्शनिंग रशिया एंड ईरान एक्ट ऑफ 2026 के नाम से भी जाना जाता है, पर अपने दस्तखत किए। यह नया कानून न केवल रूस और ईरान पर मौजूदा प्रतिबंधों को और अधिक कड़ा करता है, बल्कि उन देशों के लिए भी बड़ी मुश्किलें खड़ी करता है जो रूस से ऊर्जा संसाधनों का आयात जारी रखे हुए हैं। इस कानून का सबसे महत्वपूर्ण और चर्चा में रहने वाला हिस्सा वह प्रावधान है जिसके तहत रूस से तेल और गैस खरीदने वाले देशों पर 100 प्रतिशत तक का भारी टैरिफ यानी आयात शुल्क लगाया जा सकता है।

100 प्रतिशत टैरिफ का प्रावधान और इसका दायरा

इस नए कानून के तहत अमेरिकी राष्ट्रपति को यह विशेष अधिकार दिया गया है कि वे उन देशों पर 100 प्रतिशत तक का आयात शुल्क लगा सकें जो रूस के कच्चे तेल या प्राकृतिक गैस के सबसे बड़े खरीदारों में शामिल हैं। कानून के प्रावधानों के अनुसार, उन देशों को लक्षित किया जाएगा जो कानून बनने से ठीक पहले के 12 महीनों के दौरान कुल मात्रा के आधार पर रूस के टॉप 5 खरीदारों की सूची में रहे हैं। इसका सीधा मतलब यह है कि रूस की अर्थव्यवस्था को ऊर्जा निर्यात के जरिए मिलने वाले धन के प्रवाह को रोकने के लिए अमेरिका अब उन देशों पर भारी आर्थिक दबाव बनाएगा जो रूस के प्रमुख व्यापारिक भागीदार हैं और यह कानून राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के 30 दिनों के भीतर प्रभावी हो जाएगा, जिससे संबंधित देशों के पास अपनी ऊर्जा नीतियों पर पुनर्विचार करने के लिए बहुत कम समय बचा है।

भारत और चीन पर पड़ने वाला प्रभाव

इस कानून के लागू होने से भारत और चीन जैसे देशों पर दबाव काफी बढ़ गया है। वर्तमान में, अमेरिका भारत से आने वाले सामानों पर 18 प्रतिशत और चीन पर 34 प्रतिशत टैरिफ लगाता है। लेकिन इस नए कानून के बाद, यदि ये देश रूस से तेल और गैस का आयात जारी रखते हैं, तो उन पर लगने वाला शुल्क 100 प्रतिशत तक पहुंच सकता है। भारत और चीन दोनों ही रूस के बड़े ऊर्जा खरीदारों में शामिल हैं, इसलिए इस कानून का सीधा असर उनकी अर्थव्यवस्था और व्यापारिक संबंधों पर पड़ना तय है। हालांकि, कानून राष्ट्रपति ट्रंप को इस मामले में काफी अधिकार देता है। वे यह तय कर सकते हैं कि किन देशों पर टैरिफ लगाया जाए, टैरिफ की दर कितनी रखी जाए और क्या किसी देश को इन प्रतिबंधों से छूट दी जानी चाहिए या नहीं।

संसद में कानून की प्रक्रिया और मतदान

राष्ट्रपति के हस्ताक्षर से पहले, इस कानून को अमेरिकी संसद के निचले सदन यानी हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स में पेश किया गया था। बुधवार को हुए मतदान में इस प्रस्ताव को 214-211 वोटों के मामूली अंतर से मंजूरी मिली थी। यह करीबी मुकाबला दर्शाता है कि अमेरिकी राजनीति में भी इस तरह के कड़े आर्थिक कदमों को लेकर अलग-अलग राय है और इस कानून का मुख्य उद्देश्य रूस के नेतृत्व और उसके ऊर्जा क्षेत्र को सीधे तौर पर निशाना बनाना है। इसके अलावा, यह कानून मॉस्को के रक्षा उद्योग से जुड़े सहयोगियों और रूस की कथित शैडो फ्लीट के खिलाफ भी कड़ी कार्रवाई का प्रावधान करता है, जो अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों से बचने के लिए गुप्त रूप से तेल का व्यापार करती है।

शैडो फ्लीट और रक्षा उद्योग पर कार्रवाई

कानून के तहत उन विदेशी व्यक्तियों और संस्थाओं को भी निशाना बनाया जाएगा जो रूसी ऊर्जा उत्पादन में मदद करते हैं या प्रतिबंधों से बचने के लिए रूस का साथ देते हैं। इसमें जहाजों के मालिक, ऑपरेटर, मैनेजर, बीमाकर्ता और अन्य संबंधित पक्ष शामिल हैं। अमेरिका का मानना है कि रूस अपनी शैडो फ्लीट के जरिए वैश्विक प्रतिबंधों को दरकिनार कर रहा है, और यह नया कानून उस पूरे तंत्र को ध्वस्त करने के लिए बनाया गया है और जो भी संस्था या व्यक्ति रूस के इस गुप्त व्यापारिक नेटवर्क का हिस्सा पाया जाएगा, उसे अमेरिकी प्रतिबंधों और भारी जुर्माने का सामना करना पड़ेगा।

छूट के लिए निर्धारित शर्तें

कानून में कुछ ऐसी शर्तें भी रखी गई हैं जिनके आधार पर किसी देश को इन भारी शुल्कों से छूट मिल सकती है और यदि कोई देश रूस से गैस खरीदता है, तो उसे छूट तभी मिल सकती है जब संबंधित अवधि में उस देश का रूसी गैस आयात रूस के कुल गैस निर्यात के 15 प्रतिशत से कम हो। इसके साथ ही, उस देश को यह भी साबित करना होगा कि उसने रूसी गैस पर अपनी निर्भरता कम करने के लिए महत्वपूर्ण और ठोस कदम उठाए हैं और यह प्रावधान उन देशों को प्रोत्साहित करने के लिए है जो धीरे-धीरे रूस से अपना व्यापार खत्म करना चाहते हैं। हालांकि, इन सभी शर्तों के बावजूद अंतिम निर्णय राष्ट्रपति के विवेक पर निर्भर करेगा कि वे किस देश को कितनी राहत देना चाहते हैं।

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