दिल्ली एसआईआर पर सुप्रीम कोर्ट सख्त चुनाव आयोग से दो हफ्ते में मांगा जवाब

दिल्ली एसआईआर मामले में सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग से पूछा है कि पहले से मतदाता सूची में शामिल लोगों से फॉर्म 6 क्यों भरवाया जा रहा है। कोर्ट ने दो हफ्ते में जवाब मांगा है।

Oct 28, 2026 - 22:35
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दिल्ली एसआईआर पर सुप्रीम कोर्ट सख्त चुनाव आयोग से दो हफ्ते में मांगा जवाब

दिल्ली में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर (SIR) को चुनौती देने वाली याचिका पर बुधवार को सुप्रीम कोर्ट में एक महत्वपूर्ण सुनवाई हुई। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में कड़ा रुख अपनाते हुए चुनाव आयोग से तीखे सवाल किए हैं। कोर्ट ने मुख्य रूप से यह जानना चाहा है कि जो मतदाता पहले से ही 2026 की मतदाता सूची में शामिल हैं, उन्हें नए मतदाता के रूप में पंजीकरण के लिए 'फॉर्म 6' भरने के लिए क्यों कहा जा रहा है, जबकि उन्होंने दिल्ली एसआईआर में गणना फॉर्म नहीं भरे थे। इस पूरी प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए सर्वोच्च अदालत ने चुनाव आयोग को इस पर दो हफ्ते के भीतर अपना विस्तृत जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है। यह गंभीर सवाल तब सामने आया है जब लगभग 43 लाख लोगों को स्थान बदलने या अनुपस्थित होने के कारण ड्राफ्ट मतदाता सूची से बाहर कर दिया गया है।

सुप्रीम कोर्ट ने उठाया फॉर्म-6 के इस्तेमाल पर सवाल

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट रूप से टिप्पणी की कि 'फॉर्म-6' मुख्य रूप से उन लोगों के लिए है जो पहली बार अपना वोट देने जा रहे हैं। अदालत ने कहा कि जो लोग पहले से ही 2026 की मतदाता सूची में शामिल हैं और केवल एक जगह से दूसरी जगह गए हैं, उन्हें 'फॉर्म-8' का उपयोग करने की अनुमति मिलनी चाहिए। ऐसे पुराने और वैध मतदाताओं से यह घोषणा करने के लिए बिल्कुल नहीं कहा जाना चाहिए कि वे पहले कभी मतदाता सूची में शामिल नहीं रहे थे। कोर्ट ने अपनी बात को स्पष्ट करते हुए यह भी कहा कि कुछ समय के लिए अपने घर से बाहर रहना स्थायी रूप से जगह बदलना नहीं कहलाता है। यदि कोई नागरिक काम के सिलसिले में एक या दो महीने के लिए बाहर रहता है, तो इससे कोई भी मतदाता स्थायी रूप से स्थानांतरित नहीं हो जाता है। अदालत ने इसे लेकर प्रशासनिक व्यवस्था की आलोचना की और इसमें सुधार करने की बात कही है।

तार्किक विसंगति और चुनाव आयोग का रुख

सुनवाई के दौरान जस्टिस बागची ने एक बेहद महत्वपूर्ण सवाल उठाया और उन्होंने पूछा कि क्या कोई ऐसा मतदाता, जो किसी कारणवश अपना गणना फॉर्म समय पर नहीं भर पाया, वह हमेशा के लिए अपना वोट देने का अधिकार खो देता है। उन्होंने इसे एक ऐसी संरचनात्मक विसंगति करार दिया जिसे तुरंत ठीक किए जाने की सख्त जरूरत है। सुप्रीम कोर्ट ने कड़े शब्दों में यह भी कहा कि जब तक अंतिम मतदाता सूची पूरी तरह से तैयार नहीं हो जाती, तब तक केवल इसलिए किसी भी फॉर्म को सीधे तौर पर खारिज करने का कोई औचित्य नहीं बनता है कि उसकी निर्धारित समय-सीमा निकल चुकी है और इस पर प्रतिक्रिया देते हुए चुनाव आयोग ने अदालत को आश्वासन दिया कि वह देर से जमा किए गए पंजीकरण फॉर्मों को भी स्वीकार करने पर गंभीरता से विचार करेगा। आयोग ने यह भी कहा कि यदि जरूरत पड़ी तो वह इसके लिए 30 अक्टूबर की तय समय-सीमा को भी आगे बढ़ा देगा।

बिहार एसआईआर मामले और अन्य बयानों पर स्पष्टीकरण

दिल्ली एसआईआर मामले की इस महत्वपूर्ण सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने बिहार एसआईआर मामले का भी जिक्र किया। अदालत ने स्पष्ट किया कि बिहार एसआईआर मामले में हमने तार्किक विसंगति के मुद्दे पर कोई भी अंतिम फैसला नहीं लिया था। कोर्ट ने कहा कि पश्चिम बंगाल के मामले में इसे केवल एक अंतरिम व्यवस्था के तौर पर अनुमति दी गई थी। हमने इस पर कोई ठोस फैसला नहीं दिया है, लेकिन अक्सर लोग बिहार वाले फैसले का हवाला देते हैं और यह दावा करते हैं कि सब कुछ पहले से ही तय हो चुका है। जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने सुनवाई के दौरान इस बात पर भी जोर दिया कि सुप्रीम कोर्ट ने लॉजिकल डिसक्रिपेंसी यानी तार्किक विसंगति श्रेणी को कानूनी रूप से मान्यता नहीं दी है। अब इस मामले में चुनाव आयोग के दो हफ्ते के भीतर आने वाले जवाब पर सभी की निगाहें टिकी हुई हैं, जिससे यह साफ हो सके कि दिल्ली के लाखों मतदाताओं के भविष्य को लेकर आगे क्या कदम उठाए जाएंगे।

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