बलूचिस्तान संकट को भारत से जोड़ रहा पाकिस्तान, फितना अल-हिंदुस्तान नैरेटिव के पीछे की रणनीति
पाकिस्तान ने बलूचिस्तान की आंतरिक समस्या को भारत से जोड़ने के लिए 'फितना अल-हिंदुस्तान' का नया नैरेटिव तैयार किया है। जानें इसके पीछे की पूरी रणनीति।
पाकिस्तान बलूचिस्तान में जारी हिंसा और अलगाववादी आंदोलन को एक बार फिर भारत से जोड़ने की पुरजोर कोशिश कर रहा है। इसके लिए पाकिस्तान ने एक नया नैरेटिव यानी विमर्श तैयार किया है, जिसमें बलूच विद्रोही संगठनों को फितना अल-हिंदुस्तान के रूप में परिभाषित किया जा रहा है। इसका सीधा अर्थ यह है कि पाकिस्तान इन संगठनों को भारत से जुड़ा हुआ खतरा बता रहा है। यह पाकिस्तान की दशकों पुरानी आंतरिक समस्या को एक बाहरी दुश्मन के सिर मढ़ने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है।
मस्तुंग हमला और सुरक्षा बलों को नुकसान
24 अगस्त को बलूच लिबरेशन आर्मी यानी BLA ने बलूचिस्तान के मस्तुंग इलाके में पाकिस्तानी सुरक्षा बलों पर एक बड़े हमले की जिम्मेदारी ली। BLA का दावा है कि एक IED हमले के जरिए 13 पाकिस्तानी सैनिक मारे गए हैं। यह हमला ऐसे समय में हुआ है जब पाकिस्तान सरकार और सेना बलूचिस्तान में बड़े स्तर पर आतंकवाद विरोधी अभियान चलाने का दावा कर रही है। इस हमले ने पाकिस्तान के सुरक्षा दावों पर सवाल खड़े कर दिए हैं और क्षेत्र में अस्थिरता को उजागर किया है।
सरकारी स्तर पर नैरेटिव का इस्तेमाल
पाकिस्तान लंबे समय से बलूचिस्तान में होने वाली हिंसा के लिए भारत पर आरोप लगाता रहा है, लेकिन अब इस आरोप को आधिकारिक सरकारी भाषा का हिस्सा बना दिया गया है और मई 2025 में पाकिस्तान के गृह मंत्रालय ने एक महत्वपूर्ण निर्देश जारी किया था। इस निर्देश में सरकारी संस्थानों को कहा गया था कि बलूचिस्तान में सक्रिय विद्रोही संगठनों के लिए अनिवार्य रूप से फितना अल-हिंदुस्तान शब्द का इस्तेमाल किया जाए। इसके बाद से पाकिस्तानी सेना और सरकार के आधिकारिक बयानों में यह शब्द लगातार दिखाई देने लगा है।
21 अगस्त को पाकिस्तान की सेना के जनसंपर्क विभाग यानी ISPR ने एक दावा किया कि खैबर पख्तूनख्वा और बलूचिस्तान में सैन्य कार्रवाई के दौरान 49 आतंकवादी मारे गए हैं। सेना ने विशेष रूप से उल्लेख किया कि इनमें से 37 आतंकवादी फितना अल-हिंदुस्तान से जुड़े हुए थे। इससे स्पष्ट होता है कि पाकिस्तान अब केवल किसी एक हमले के लिए भारत को जिम्मेदार नहीं ठहरा रहा, बल्कि पूरे बलूच आंदोलन को ही भारत से जोड़ने की कोशिश कर रहा है।
बलूचिस्तान संकट की ऐतिहासिक जड़ें
बलूचिस्तान में विद्रोह और राजनीतिक असंतोष कोई नई घटना नहीं है। पाकिस्तान के निर्माण के शुरुआती वर्षों से ही इस क्षेत्र में अलगाववाद और केंद्र सरकार के खिलाफ नाराजगी देखी गई है। बलूच नेताओं की शिकायतों में राजनीतिक प्रतिनिधित्व की कमी, प्रांतीय स्वायत्तता का अभाव, प्राकृतिक संसाधनों पर अधिकार का मुद्दा, विकास में भारी असमानता और सुरक्षा बलों की सख्त कार्रवाई जैसे गंभीर विषय शामिल रहे हैं। इसलिए बलूचिस्तान की समस्या को केवल भारत की कथित साजिश के रूप में देखना इस विवाद की जटिलता को नजरअंदाज करना होगा और हालांकि, इसका यह अर्थ भी नहीं है कि विद्रोही संगठनों द्वारा किए गए हमलों को सही माना जाए, क्योंकि आम नागरिकों या सुरक्षा बलों पर हमले किसी भी स्थिति में जायज नहीं हो सकते।
पाकिस्तान के लिए भारत कार्ड का महत्व
पाकिस्तान के लिए फितना अल-हिंदुस्तान शब्द का इस्तेमाल करना राजनीतिक रूप से बहुत फायदेमंद साबित हो सकता है। इससे पाकिस्तान को अपनी आंतरिक विफलताओं को बाहरी दुश्मन से जोड़ने का मौका मिलता है और इससे यह सवाल दब जाता है कि बलूचिस्तान में दशकों से अस्थिरता क्यों है और पाकिस्तान की सुरक्षा नीतियां वहां शांति क्यों नहीं ला पाईं। खैबर पख्तूनख्वा में पाकिस्तान अक्सर तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान यानी TTP के लिए फितना अल-खवारिज शब्द का उपयोग करता है, लेकिन बलूचिस्तान के लिए उसने सीधे भारत का नाम जोड़कर नया मोर्चा खोला है।
अंतरराष्ट्रीय मंच और भारत का रुख
पाकिस्तान अब इस नैरेटिव को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी ले जा रहा है। वह दावा कर रहा है कि जिस तरह भारत पाकिस्तान पर आतंकवाद का आरोप लगाता है, उसी तरह पाकिस्तान भी भारत पर आरोप लगा सकता है। भारत ने पाकिस्तान के इस भ्रामक प्रचार का कड़ा विरोध किया है। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत ने स्पष्ट किया है कि फितना अल-हिंदुस्तान जैसे शब्द पाकिस्तान द्वारा फैलाया जा रहा प्रोपेगेंडा हैं। पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत ने पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद के खिलाफ अपना कूटनीतिक अभियान तेज किया है, जिसके जवाब में पाकिस्तान यह नई कहानी गढ़ रहा है।
बलूचिस्तान का रणनीतिक और आर्थिक महत्व
बलूचिस्तान केवल एक प्रांत नहीं है, बल्कि रणनीतिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसकी सीमाएं ईरान और अफगानिस्तान से मिलती हैं और इसके पास अरब सागर का लंबा तट है। यहीं पर चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा यानी CPEC और ग्वादर पोर्ट स्थित हैं। बलूचिस्तान में चीनी नागरिकों और परियोजनाओं पर अक्सर हमले होते रहते हैं, जो चीन के लिए बड़ी चिंता का विषय है। यहां की अस्थिरता का असर पूरे क्षेत्रीय सुरक्षा नेटवर्क पर पड़ता है।
भारत के लिए कूटनीतिक चुनौती
भारत के सामने मुख्य चुनौती यह है कि वह पाकिस्तान के इस नैरेटिव का प्रभावी ढंग से जवाब दे। भारत के लिए तीन बातें महत्वपूर्ण हैं: पहला, बलूचिस्तान का अपना राजनीतिक इतिहास है; दूसरा, आतंकवाद किसी भी रूप में स्वीकार्य नहीं है; और तीसरा, पाकिस्तान के आरोपों को बिना सबूत के स्वीकार नहीं किया जा सकता और पाकिस्तान शब्दों को हथियार बनाकर बलूचिस्तान की जटिल समस्या की पूरी जिम्मेदारी भारत पर डालने की कोशिश कर रहा है, जिसका जवाब तथ्यों के आधार पर देना आवश्यक है।
What's Your Reaction?