मेल वोटिंग के खिलाफ आदेश पर ट्रंप को सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत, वैधता पर फैसला बाकी
सुप्रीम कोर्ट ने मेल-इन वोटिंग पर पाबंदी लगाने वाले राष्ट्रपति ट्रंप के कार्यकारी आदेश के मामले में प्रशासन का साथ दिया है, हालांकि आदेश की वैधता पर अंतिम फैसला अभी बाकी है।
संयुक्त राज्य अमेरिका के सुप्रीम कोर्ट ने मेल-इन वोटिंग को प्रतिबंधित करने के उद्देश्य से राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के कार्यकारी आदेश के संबंध में उन्हें एक बड़ी कानूनी राहत दी है। सोमवार को अदालत के रूढ़िवादी बहुमत ने ट्रंप प्रशासन का पक्ष लिया, जो चुनाव की निष्पक्षता और मतदाता पहुंच पर चल रही तीव्र बहस के बीच एक महत्वपूर्ण मोड़ है और हालांकि इस फैसले से प्रशासन को तत्काल राहत मिली है, लेकिन आदेश की अंतिम कानूनी वैधता पर अभी भी फैसला होना बाकी है। इससे आगामी मिड-टर्म चुनावों में इस आदेश के कार्यान्वयन को लेकर अनिश्चितता की स्थिति बनी हुई है और uS पोस्टल सर्विस ने पिछले हफ्ते बताया था कि वह इस आदेश को कैसे लागू करेगी, लेकिन बड़े बदलाव करने के लिए समय बहुत कम बचा है क्योंकि कुछ राज्यों में कुछ ही हफ्तों में वोटरों को मेल बैलेट भेजे जाने शुरू हो जाएंगे।
सुप्रीम कोर्ट का प्रक्रियात्मक फैसला
अदालत का यह फैसला कार्यकारी आदेश की संवैधानिक योग्यता के बजाय प्रक्रियात्मक आधारों पर केंद्रित था। कंजर्वेटिव बहुमत ने स्पष्ट किया कि इस आदेश को चुनौती देने वाले राज्यों के पास फिलहाल ऐसा करने का कानूनी अधिकार नहीं है और एक बिना हस्ताक्षर वाले आदेश में बहुमत ने लिखा कि इस अर्ज़ी पर कोर्ट के फैसले का यह अर्थ बिल्कुल नहीं है कि सरकार द्वारा आदेश को लागू करने के लिए उठाया गया हर कदम कानूनी ही होगा। उन्होंने संकेत दिया कि प्रशासन के कदमों की वैधता तो आने वाला समय ही बताएगा जब इन्हें वास्तव में लागू किया जाएगा। इस फैसले में अदालत के भीतर एक स्पष्ट वैचारिक विभाजन देखा गया, जहां तीन लिबरल-विचारधारा वाले जजों ने इस फैसले से अपनी असहमति दर्ज कराई।
मेल के जरिए वोटिंग लंबे समय से राष्ट्रपति ट्रंप के निशाने पर रही है और उनका दावा है कि इस प्रणाली से बड़े पैमाने पर धोखाधड़ी होती है, हालांकि इसके विपरीत मजबूत सबूत मौजूद हैं कि यह प्रक्रिया सुरक्षित है। यह भी उल्लेखनीय है कि खुद ट्रंप भी अतीत में इस वोटिंग तरीके का इस्तेमाल कर चुके हैं। यह मामला जजों के सामने वोटिंग से जुड़ी कई चुनौतियों में से एक हो सकता है। जस्टिस डिपार्टमेंट ने एक इमरजेंसी अपील दायर करके हाई कोर्ट से मिड-टर्म चुनाव से पहले इन बदलावों को लागू करने की इजाज़त मांगी थी।
कार्यकारी आदेश और कानूनी चुनौतियां
इस कानूनी विवाद की जड़ में वह कार्यकारी आदेश है जिसे राष्ट्रपति ट्रंप ने मार्च में हस्ताक्षरित किया था। इस आदेश में प्रशासन को योग्य मतदाताओं की सूची तैयार करने का निर्देश दिया गया है। साथ ही US पोस्टल सर्विस को यह आदेश दिया गया है कि वह मेल बैलेट केवल उन्हीं लोगों तक पहुंचाए जो इन सत्यापित सूचियों में शामिल हैं। प्रशासन की इस योजना को 23 राज्यों और डिस्ट्रिक्ट ऑफ कोलंबिया के डेमोक्रेटिक अधिकारियों के कड़े विरोध का सामना करना पड़ा। इन अधिकारियों ने आदेश को रोकने के लिए मुकदमा दायर किया और तर्क दिया कि संविधान चुनाव कराने की शक्ति राज्यों और कांग्रेस को देता है, न कि कार्यकारी शाखा को।
राज्यों के वकीलों ने जोर देकर कहा कि पतझड़ में होने वाले चुनावों के इतने करीब इतने बड़े बदलावों को लागू करने के परिणाम बहुत गंभीर हो सकते हैं, जिससे अव्यवस्था और पक्षपातपूर्ण दुरुपयोग हो सकता है। दर्जनों स्थानीय चुनाव अधिकारियों ने भी जजों से इस आदेश पर रोक बनाए रखने का आग्रह किया क्योंकि चुनाव की तैयारियां पहले से ही चल रही हैं। मैसाचुसेट्स के एक जज ने पहले ही उन राज्यों में मिड-टर्म चुनाव के लिए इस योजना पर रोक लगा दी थी, जिसे बाद में एक अपील्स कोर्ट ने भी सही ठहराया। इसके बाद उन्होंने इसे पूरे देश में रोकने का एक और आदेश दिया, जो ट्रंप प्रशासन की योजना के लिए एक बड़ी बाधा बन सकता है।
जस्टिस डिपार्टमेंट के तर्क और प्रक्रिया
जुलाई के अंत में जस्टिस डिपार्टमेंट ने सुप्रीम कोर्ट में अपील करते हुए तर्क दिया कि राज्यों ने बहुत जल्दी मुकदमा दायर कर दिया है। उन्होंने वॉशिंगटन के एक अन्य फैसले का हवाला दिया जिसमें एक जज ने ट्रंप के आदेश को आगे बढ़ाने की अनुमति दी थी। एक अपीलीय अदालत ने उस फैसले का समर्थन किया था, लेकिन भविष्य में कानूनी कार्रवाई की संभावना को भी खुला रखा था। फेडरल वकीलों का तर्क था कि मैसाचुसेट्स का आदेश राष्ट्रपति की उन नीतियों को लागू करने की क्षमता को रोकता है जो नवंबर के चुनावों में निष्पक्षता को बढ़ावा देने के लिए बनाई गई हैं और लगभग एक दर्जन रिपब्लिकन झुकाव वाले राज्यों ने भी फेडरल सरकार का समर्थन किया और कहा कि अंतिम वोटर लिस्ट पर राज्यों की भी राय ली जाएगी।
ऐतिहासिक संदर्भ और आंकड़े
सुप्रीम कोर्ट ने पहले भी मेल-इन बैलेट से जुड़े मामलों पर सुनवाई की है। जून में अदालत ने ट्रंप समर्थित तर्कों के खिलाफ फैसला सुनाते हुए कहा था कि राज्य चुनाव के दिन के बाद आने वाले बैलेट की गिनती कर सकते हैं। ट्रंप ने बिना किसी ठोस सबूत के 2020 में जो बाइडन से अपनी हार के लिए मेल वोटिंग को जिम्मेदार ठहराया है। उन्होंने अपने कार्यकारी आदेश को गैर-अमेरिकी नागरिकों को वोट देने से रोकने के उपाय के रूप में पेश किया है। उन्होंने बार-बार ऐसे कानून को पास करने पर जोर दिया है जिसके तहत वोट देने के लिए नागरिकता का सबूत देना ज़रूरी हो।
फेडरल डेटा के अनुसार, मेल बैलेट का उपयोग दोनों पार्टियों के मतदाताओं के बीच तेजी से लोकप्रिय हुआ है और 2024 के राष्ट्रपति चुनाव में लगभग 30 प्रतिशत वोट इसी माध्यम से डाले गए थे। ब्रुकिंग्स इंस्टीट्यूशन की 2025 की एक स्टडी के अनुसार, यह प्रक्रिया अत्यंत सुरक्षित है और इसमें हर 10 मिलियन मेल बैलेट में धोखाधड़ी के केवल 4 मामले ही सामने आए हैं। गैर-नागरिकों का वोट देना बहुत कम देखा गया है और यह एक गंभीर अपराध है जिसके लिए देश से निकाला जा सकता है।
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