30 दिन जेल में रहे तो जाएगी PM-CM की कुर्सी: संसदीय समिति प्रावधान बरकरार रखने के पक्ष में

संसदीय समिति 130वें संविधान संशोधन विधेयक में 30 दिन जेल में रहने पर PM और CM को पद से हटाने के प्रावधान को बरकरार रखने के पक्ष में है। रिपोर्ट 17 जुलाई को आएगी।

Jul 1, 2026 - 22:35
 0  0
30 दिन जेल में रहे तो जाएगी PM-CM की कुर्सी: संसदीय समिति प्रावधान बरकरार रखने के पक्ष में

130वें संविधान संशोधन विधेयक की समीक्षा कर रही संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) एक अत्यंत महत्वपूर्ण प्रावधान को बरकरार रखने के पक्ष में है। सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, समिति उस नियम को हटाने के लिए तैयार नहीं है जिसके तहत यदि कोई प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, केंद्रीय मंत्री या राज्य मंत्री किसी गंभीर अपराध के मामले में गिरफ्तार होने के बाद लगातार 30 दिनों तक न्यायिक हिरासत में रहता है, तो उसे अपना पद छोड़ना पड़ सकता है। इस विधेयक को सरकार आगामी मानसून सत्र में दोबारा संसद के पटल पर रख सकती है, जिसके 20 जुलाई से शुरू होने की संभावना है।

संसदीय समिति की रिपोर्ट और मुख्य प्रावधान

अपराजिता सारंगी की अध्यक्षता वाली 31 सदस्यीय संयुक्त संसदीय समिति 17 जुलाई को लोकसभा अध्यक्ष को अपनी रिपोर्ट सौंप सकती है। इस विधेयक का प्राथमिक उद्देश्य हिरासत में लिए जाने की स्थिति में मंत्रियों को उनके पद से हटाना है। विधेयक के प्रावधानों के अनुसार, यदि किसी मंत्री पर ऐसे अपराध का आरोप है जिसमें 5 साल या उससे अधिक की सजा का प्रावधान है और वह व्यक्ति 30 दिनों तक हिरासत में रहता है, तो उसे राष्ट्रपति या राज्यपाल द्वारा पदमुक्त कर दिया जाएगा। यदि ऐसी कार्रवाई नहीं होती है, तो 31वें दिन वह स्वतः ही पद से मुक्त माना जाएगा। हालांकि, रिपोर्ट में कुछ सुरक्षात्मक उपाय जोड़े जा सकते हैं ताकि राजनीतिक बदले की भावना से झूठे मामलों में गिरफ्तारी कर किसी सरकार को अस्थिर करने के लिए इस कानून का दुरुपयोग न किया जा सके।

विपक्ष का विरोध और सरकार का तर्क

गृह मंत्री अमित शाह ने इससे जुड़े 3 बिलों को पिछले मानसून सत्र में संसद के दोनों सदनों में पेश किया था, जिसके बाद इन्हें जेपीसी को भेजने का प्रस्ताव मंजूर किया गया था। कांग्रेस सहित विपक्ष के इंडिया (INDIA) गठबंधन के अधिकांश सदस्यों ने इस समिति का बहिष्कार किया था। विपक्ष का आरोप है कि सत्ता पक्ष उनके सुझावों को दरकिनार कर देगा और बिल को मंजूरी दिलाने के लिए समिति का इस्तेमाल सिर्फ एक रबर स्टैम्प के तौर पर करेगा। विपक्ष का तर्क है कि यह विधेयक अलोकतांत्रिक, संघवाद-विरोधी और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत के खिलाफ है, क्योंकि यह सजा मिलने से पहले केवल हिरासत के आधार पर कार्रवाई की बात करता है। इसके विपरीत, सत्ता पक्ष का मानना है कि 30 दिन का समय कम से कम तीन बार जमानत याचिका दायर करने के लिए पर्याप्त होता है।

समिति के सदस्य और असहमति के स्वर

इस 31 सदस्यीय समिति में असदुद्दीन ओवैसी और सुप्रिया सुले जैसे विपक्षी नेता भी शामिल हैं, जो इस रिपोर्ट पर अपना असहमति पत्र (Dissent Note) दे सकते हैं। राज्यसभा सांसद और वाईएसआरसीपी (YSRCP) के नेता एस निरंजन रेड्डी भी इस पैनल का हिस्सा हैं और समिति अपराध की प्रकृति को सीमित करने और दुरुपयोग रोकने के लिए अतिरिक्त प्रावधान जोड़ने की सिफारिश कर सकती है। यह विधेयक भारतीय राजनीति के ढांचे में एक बड़ा बदलाव ला सकता है, क्योंकि यह पहली बार हिरासत की अवधि के आधार पर शीर्ष संवैधानिक पदों पर बैठे व्यक्तियों की जवाबदेही तय करने का प्रयास कर रहा है। अब सभी की नजरें 17 जुलाई को पेश होने वाली रिपोर्ट और उसके बाद मानसून सत्र की कार्यवाही पर टिकी हैं।

What's Your Reaction?

like

dislike

love

funny

angry

sad

wow