RBI के फैसले के बाद बैंकों ने FCNR ब्याज दरों में की भारी कटौती, जानें नए रेट्स
आरबीआई की स्वैप विंडो बंद होने के बाद एसबीआई, एचडीएफसी और आईसीआईसीआई ने एफसीएनआर ब्याज दरों में 310 बेसिस पॉइंट तक की कटौती की है। जानें नए रेट्स।
भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा अपनी विशेष स्वैप विंडो को बंद करने के निर्णय के तुरंत बाद देश के बैंकिंग क्षेत्र में बड़ी हलचल देखी जा रही है। प्रमुख भारतीय बैंकों ने प्रवासी भारतीयों यानी एनआरआई ग्राहकों को दिए जाने वाले विदेशी मुद्रा अनिवासी (एफसीएनआर) जमा पर ब्याज दरों में भारी कटौती कर दी है। यह कदम उन एनआरआई निवेशकों के लिए एक बड़े झटके के रूप में आया है जो डॉलर में निवेश कर भारत में उच्च रिटर्न प्राप्त कर रहे थे। रिजर्व बैंक की इस विशेष सुविधा के समाप्त होते ही बैंकों ने वह अतिरिक्त लाभ वापस ले लिया है जो वे पिछले कुछ हफ्तों से ग्राहकों को दे रहे थे। 31 अगस्त से यह सुविधा बंद होने के बाद अब नई दरें प्रभावी हो गई हैं।
एचडीएफसी और आईसीआईसीआई बैंक की दरों में भारी गिरावट
निजी क्षेत्र के सबसे बड़े ऋणदाता एचडीएफसी बैंक ने अपनी एफसीएनआर जमा दरों में सबसे अधिक कटौती की है। बैंक ने पांच साल की अवधि के लिए अमेरिकी डॉलर एफसीएनआर (बी) दरों को 6 प्रतिशत 25 से घटाकर सीधे 3 प्रतिशत 15 कर दिया है। यह कटौती 310 बेसिस पॉइंट की है, जो बैंक की जमा नीतियों में एक बड़ा बदलाव दर्शाती है। इसी तरह आईसीआईसीआई बैंक ने भी अपने पांच साल के डॉलर डिपॉजिट रेट में 310 बेसिस पॉइंट की कमी की है। बैंक ने इस दर को 6 प्रतिशत से घटाकर 2 प्रतिशत 90 कर दिया है। इन बदलावों के बाद अब लंबी अवधि के लिए डॉलर जमा करना पहले की तुलना में काफी कम आकर्षक हो गया है और बैंकों ने प्रीमियम देना बंद कर दिया है।
स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के ग्राहकों के लिए बदला समीकरण
देश के सबसे बड़े सरकारी बैंक एसबीआई का हाल भी कुछ ऐसा ही है। बैंक का रेगुलर 5 वर्षीय एफसीएनआर (बी) रेट अब 3 प्रतिशत 5 हो गया है। इससे पहले 10 लाख डॉलर तक की जमा पर बैंक अपनी एडवांटेज स्कीम के तहत 5 प्रतिशत 75 का रिटर्न दे रहा था, जिसमें अब 270 बेसिस पॉइंट की कटौती हुई है। वहीं 10 लाख डॉलर से ज्यादा के डिपॉजिट पर एसबीआई 6 प्रतिशत ब्याज दे रहा था, जिसमें अब 295 बेसिस पॉइंट की कमी आ गई है। यह कटौती दर्शाती है कि बैंक अब विदेशी मुद्रा जुटाने के लिए अतिरिक्त खर्च करने के मूड में नहीं हैं क्योंकि रिजर्व बैंक का समर्थन अब उपलब्ध नहीं है।
रिजर्व बैंक का फैसला और फंड जुटाने का रिकॉर्ड
यह सारा बदलाव आरबीआई के एक महत्वपूर्ण कदम के कारण हुआ है। केंद्रीय बैंक ने 8 जून को डॉलर-रुपया स्वैप सुविधा शुरू की थी, जिससे बैंकों को विदेशी मुद्रा जुटाने की लागत कम पड़ रही थी। इसी का फायदा उठाकर बैंकों ने एनआरआई ग्राहकों को ऊंचे रिटर्न का लालच दिया था। इस स्कीम को इतना जबरदस्त रिस्पॉन्स मिला कि केवल 10 हफ्तों में ही भारतीय बैंकों ने 65 अरब 40 करोड़ डॉलर का विदेशी फंड इकट्ठा कर लिया। अगर ओवरसीज उधारी समेत समग्र विदेशी मुद्रा प्रवाह को देखें तो यह आंकड़ा 73 अरब डॉलर तक पहुंच गया। लक्ष्य से ज्यादा पैसा आने के कारण आरबीआई ने 30 सितंबर की अपनी समय सीमा को घटाकर 31 अगस्त कर दिया, जिसके बाद बैंकों ने तुरंत ब्याज दरों में कटौती कर दी।
विशेषज्ञों की राय और बाजार की स्थिति
केयरएज रेटिंग्स के सीनियर डायरेक्टर संजय अग्रवाल का कहना है कि इस स्कीम से बैंकों को विदेशी मुद्रा फंडिंग का एक नया विकल्प मिला था, जिससे बैंकों की लिक्विडिटी यानी तरलता में काफी सुधार हुआ। हालांकि अब यह सुविधा बंद हो गई है, तो लंबी अवधि के डॉलर जमा पर मिलने वाला अतिरिक्त लाभ धीरे-धीरे कम हो गया है। दिलचस्प बात यह है कि बैंकों ने लंबी अवधि की दरों में तो भारी कटौती की है, लेकिन छोटी अवधि के रेट लगभग स्थिर बने हुए हैं। इससे साफ होता है कि बिना आरबीआई के सपोर्ट के बैंक लंबे समय के लिए डॉलर डिपॉजिट पर भारी प्रीमियम देने के पक्ष में नहीं हैं। एनआरआई ग्राहकों के लिए डॉलर में कमाई कर भारत में मोटा ब्याज कमाने का सुनहरा दौर फिलहाल के लिए थम गया है।
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