ईरान का अमेरिका को नया प्रस्ताव: 7 दिन में खुल सकता है होर्मुज, रखीं कड़ी शर्तें
ईरान ने अमेरिका को 7 दिन में होर्मुज खोलने का प्रस्ताव दिया है। शर्तों में तेल पाबंदियां हटाना और 12 अरब डॉलर के फ्रीज खाते खोलना शामिल है।
ईरान ने संयुक्त राज्य अमेरिका के सामने एक अत्यंत महत्वपूर्ण और नया प्रस्ताव पेश किया है, जिसके तहत रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को मात्र सात दिनों के भीतर फिर से खोला जा सकता है। इस प्रस्ताव के अनुसार, यदि अमेरिका ईरान द्वारा रखी गई कुछ विशिष्ट शर्तों को स्वीकार कर लेता है, तो न केवल समुद्री मार्ग को सुचारू किया जाएगा, बल्कि ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर रुकी हुई बातचीत को भी फिर से शुरू किया जा सकता है। ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने न्यूयॉर्क में आयोजित संयुक्त राष्ट्र महासभा के दौरान एक निजी बैठक में इस नए घटनाक्रम की जानकारी साझा की है। यह प्रस्ताव विभिन्न मध्यस्थों के माध्यम से अमेरिकी प्रशासन तक पहुँचाया गया है, जो दोनों देशों के बीच संवाद के सेतु के रूप में कार्य कर रहे हैं।
ईरान की प्रमुख शर्तें और सात दिनों की समयसीमा
ईरान द्वारा रखे गए इस प्रस्ताव में कई कड़ी शर्तें शामिल हैं जिन्हें अमेरिका को पूरा करना होगा। ईरान चाहता है कि अमेरिका उसके बंदरगाहों की नौसैनिक नाकेबंदी को पूरी तरह से समाप्त करे और ईरानी तेल की अंतरराष्ट्रीय बाजार में बिक्री पर लगी सभी पाबंदियों को हटा दे। इसके साथ ही, ईरान ने सात दिनों के युद्धविराम की मांग की है, जिसमें लेबनान को भी अनिवार्य रूप से शामिल किया जाना चाहिए। एक और बड़ी शर्त ईरान के उन विदेशी खातों को रिलीज करने की है जो वर्तमान में फ्रीज किए गए हैं, जिनकी राशि कम से कम 12 अरब डॉलर बताई गई है। अराघची के स्पष्टीकरण के अनुसार, यदि अमेरिका इन शर्तों को स्वीकार करता है, तो उसके अगले दिन से सात दिनों की समयसीमा की गिनती शुरू हो जाएगी। सातवें दिन, ईरान स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को खोलने और परमाणु वार्ता की मेज पर लौटने का वादा कर रहा है। हालांकि, इस समय पूरी दुनिया की नजरें अमेरिका की प्रतिक्रिया पर टिकी हैं कि क्या वह इन शर्तों को स्वीकार करेगा।
होर्मुज का सामरिक महत्व और वैश्विक प्रभाव
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों में से एक है। युद्ध की स्थिति उत्पन्न होने से पहले, दुनिया के कुल तेल कारोबार का लगभग पांचवां हिस्सा इसी संकरे रास्ते से होकर गुजरता था। यही कारण है कि इस क्षेत्र में जहाजों की आवाजाही में किसी भी प्रकार की बाधा का असर केवल पश्चिम एशिया तक सीमित नहीं रहता, बल्कि इसका सीधा प्रभाव वैश्विक ऊर्जा बाजार और तेल की कीमतों पर पड़ता है और ईरान के लिए होर्मुज इस समय अमेरिका पर दबाव बनाने का एक शक्तिशाली जरिया बन गया है, क्योंकि इसके बंद होने की आशंका अंतरराष्ट्रीय समुदाय के लिए बड़ी आर्थिक और रणनीतिक चिंता का विषय है।
जून के समझौते से तुलना और बदलाव
ईरान का यह नया प्रस्ताव इस साल जून में हुए अमेरिका-ईरान समझौते के प्रारूप से काफी मिलता-जुलता है। उस समय के समझौते में 60 दिन का समय निर्धारित किया गया था ताकि युद्धविराम के दौरान आगे की बातचीत को आगे बढ़ाया जा सके। उस योजना में भी ईरानी तेल निर्यात पर छूट और होर्मुज में समुद्री आवाजाही को सामान्य करने की बात शामिल थी और हालांकि, जुलाई में दोनों पक्षों के बीच तनाव फिर से बढ़ गया और वह समझौता टूट गया। इस बार ईरान ने प्रक्रिया को काफी तेज करने का प्रस्ताव रखा है और इसे केवल सात दिनों के भीतर पूरा करने की बात कही है।
अमेरिका और सऊदी अरब का रुख
अमेरिकी प्रशासन ने कहा है कि ईरान के साथ युद्ध को लेकर मध्यस्थों के माध्यम से चल रही बातचीत सकारात्मक दिशा में है और हालांकि, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पहले ही स्पष्ट कर दिया है कि उन्हें किसी भी समझौते की जल्दबाजी नहीं है। क्विंसी इंस्टीट्यूट के त्रिता पारसी के विश्लेषण के अनुसार, ईरान का मानना है कि यदि यह समझौता जल्दी हो जाता है, तो इससे ट्रंप को नवंबर के मध्यावधि चुनाव से पहले राजनीतिक लाभ मिल सकता है, क्योंकि इससे तेल और गैस की कीमतों का दबाव कम होगा। इसके बावजूद, ईरान के इस प्रस्ताव को लेकर संदेह भी जताया जा रहा है कि कहीं वह इसका उपयोग केवल अपने तेल निर्यात को बढ़ाने और आर्थिक दबाव को कम करने के लिए तो नहीं करना चाहता और सऊदी अरब भी इस प्रस्ताव को लेकर आशंकित है। पहले खाड़ी देश बातचीत की वापसी के पक्ष में थे, लेकिन यमन में हूती विद्रोहियों की बढ़ती गतिविधियों और सऊदी की एक महत्वपूर्ण पाइपलाइन पर हमले के बाद उनके रुख में बदलाव आया है।
यमन की स्थिति और मध्यस्थता के प्रयास
ईरान के इस नए प्रस्ताव में लेबनान को तो शामिल किया गया है, लेकिन यमन के संघर्ष को इसमें शामिल किया जाएगा या नहीं, इस पर स्थिति अभी स्पष्ट नहीं है। इस बीच, कतर के प्रधानमंत्री ने ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन से मुलाकात की है, जो अमेरिका और ईरान के बीच एक प्रमुख मध्यस्थ की भूमिका निभा रहे हैं। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने भी संकेत दिया है कि जब भी विचारों और संदेशों को साझा करने का अवसर मिलेगा, अमेरिका ऐसा करेगा और अब देखना यह है कि क्या यह सात दिवसीय योजना धरातल पर उतर पाती है या नहीं।
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