नेहरू से आगे निकले पीएम मोदी: अपनी चुनावी उपलब्धियों से भारतीय सियासत में लिख रहे नई इबारत

जानिए कैसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चुनावी राजनीति में पंडित नेहरू के रिकॉर्ड की बराबरी की और भाजपा को विश्व की सबसे बड़ी राजनीतिक शक्ति के रूप में स्थापित किया।

Jun 9, 2026 - 08:35
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नेहरू से आगे निकले पीएम मोदी: अपनी चुनावी उपलब्धियों से भारतीय सियासत में लिख रहे नई इबारत

पंडित जवाहरलाल नेहरू ने लगातार तीन चुनाव जीतकर कांग्रेस का दबदबा कायम किया था। अब नरेंद्र मोदी भी जीत की हैट्रिक लगाकर तीसरी बार देश के प्रधानमंत्री बने हैं और पीएम मोदी ने उस भाजपा को राष्ट्रीय स्तर पर पूर्ण बहुमत दिलाया, जो पहले संघर्ष कर रही थी। उन्होंने पार्टी का व्यापक विस्तार किया, उसे हमेशा चुनावी मोड में रखा और विश्व की सबसे बड़ी पार्टी बनाया। यह उनकी असाधारण चुनावी उपलब्धियों को दर्शाता है। निर्वाचित प्रधानमंत्री के तौर पर पंडित नेहरू को पीछे छोड़ रहे नरेंद्र मोदी की चुनावी उपलब्धियों की चर्चा होना स्वाभाविक है। पंडित नेहरू की अगुवाई में कांग्रेस ने लगातार तीन चुनाव जीतकर केंद्र से राज्यों तक अपना दबदबा कायम रखा था। दिलचस्प है कि नरेंद्र मोदी भी जीत की हैट्रिक के जरिए तीसरी बार देश के प्रधानमंत्री हैं। पंडित नेहरू आजादी के पहले से ही अंतरिम सरकार के मुखिया के तौर पर सत्ता में थे, तब विपक्ष की उपस्थिति केवल प्रतीकात्मक थी।

नेहरू और मोदी के राजनीतिक सफर का अंतर

दूसरी तरफ मोदी पहली बार राष्ट्रीय स्तर पर 2014 में चुनावी मैदान में उस भाजपा की अगुवाई कर रहे थे, जो इससे पहले केंद्र में कभी पूर्ण बहुमत नहीं हासिल कर सकी थी। 2004 के चुनाव में पार्टी ने गठबंधन की सरकार भी गंवा दी थी और 2009 के चुनाव में उसका प्रदर्शन और भी निराशाजनक रहा था। कठिन दौर में भाजपा को उबारने और उसके व्यापक विस्तार का श्रेय मोदी को जाता है। पंडित नेहरू आजादी के संघर्ष के महानायकों में एक थे और उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि काफी समृद्ध थी। गांधी जी के संरक्षण में नेहरू के सार्वजनिक जीवन की शुरुआत ही देश के अगली कतार के नेता के तौर पर हुई और आजादी के ठीक पहले 1946 के सेंट्रल असेंबली के चुनाव में कांग्रेस की अगुवाई में गठित वायसराय की कार्यपरिषद में नेहरू को उपाध्यक्ष पद प्राप्त हुआ, जो प्रधानमंत्री के समकक्ष था। 15 अगस्त 1947 को आजादी के बाद अस्थायी लोकसभा ने उन्हें प्रधानमंत्री के रूप में स्वीकार किया।

चुनावी राजनीति का बदलता स्वरूप

1951-52 के पहले आमचुनाव में पंडित नेहरू पहले से ही प्रधानमंत्री पद पर आसीन थे। उस समय विपक्ष के तौर पर मुख्य रूप से वे पार्टियां थीं जिनके नेता आजादी के आंदोलन का हिस्सा थे, लेकिन बाद में उनका कांग्रेस से मोहभंग हो गया था। साधनों और संगठन के मामले में वे कांग्रेस के मुकाबले काफी कमजोर थीं। भारतीय जनसंघ तब अपनी शैशवास्था में था। नेहरू के पास कांग्रेस की वह विरासत थी जो आजादी के आंदोलन का मंच थी। 1962 के तीसरे चुनाव तक नेहरू ने जीत का सिलसिला जारी रखा। हालांकि, नेहरू के निधन के 50 वर्ष बाद 2014 में जब मोदी केंद्र की राजनीति में आए, तब तक तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी थी। 1967 से कांग्रेस का वर्चस्व टूटना शुरू हुआ और 1989 से गठबंधन सरकारों का दौर शुरू हुआ। 1990 के दशक में 1991, 1996, 1998 और 1999 में चार लोकसभा चुनाव हुए और पांच सरकारें बदलीं।

भाजपा का संघर्ष और मोदी का उदय

इसी दौर में अटल बिहारी वाजपेयी को तीन बार प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने का मौका मिला। पहली बार 16 दिन और दूसरी बार 573 दिन सरकार चली। 1999 की उनकी तीसरी सरकार टिकाऊ रही, लेकिन 2004 में इंडिया शाइनिंग के बावजूद भाजपा 138 सीटों पर सिमट गई। 2009 में यह संख्या और घटकर 116 रह गई। लगातार दो हार से भाजपा में निराशा थी, लेकिन 2013 में नरेंद्र मोदी को आगे करने के फैसले ने पार्टी में जोश भर दिया। 2001 से गुजरात के मुख्यमंत्री रहे मोदी ने अपनी राष्ट्रीय पहचान बना ली थी। एक सामान्य और आर्थिक रूप से कमजोर परिवार से आने वाले मोदी का जीवन संघर्षपूर्ण रहा। संघ के बाल स्वयंसेवक से भाजपा के सामान्य कार्यकर्ता और फिर मुख्यमंत्री बनने तक उन्होंने कड़ी मेहनत की। 2002 के दंगों को लेकर उन पर हमले हुए, लेकिन वे हर मोर्चे पर बेदाग साबित हुए, जिसने उन्हें और मजबूत बनाया।

ऐतिहासिक जीत और मिथकों का टूटना

2014 के चुनाव में मोदी ने वाराणसी को अपना कार्यक्षेत्र बनाया और इतिहास रच दिया। भाजपा 2009 की 116 सीटों से बढ़कर 282 पर पहुंच गई। पिछला 18 दशमलव 80 प्रतिशत वोट शेयर इस चुनाव में बढ़कर 31 प्रतिशत हो गया। 63 वर्षों की यात्रा में पहली बार भाजपा पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने में सफल हुई। मोदी ने इस मिथ को भी तोड़ा कि केंद्र में बहुमत के लिए मुस्लिम वोटरों का समर्थन अनिवार्य है। 2019 में मोदी का जादू फिर चला और पार्टी 282 से बढ़कर 303 सीटों पर पहुंच गई, जबकि वोट शेयर 31 प्रतिशत से बढ़कर 37 दशमलव 3 प्रतिशत हो गया। मोदी के नाम पर भाजपा का विस्तार पिछड़ों, दलितों और ग्रामीण क्षेत्रों में हुआ। उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में, जहां पार्टी 2002 से मुख्य मुकाबले से बाहर थी, मोदी की अगुवाई में 2017 और 2022 में लगातार दो बार पूर्ण बहुमत की सरकार बनी।

2024 की चुनौतियां और भविष्य की रणनीति

2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा का वोट प्रतिशत 36 दशमलव 97 प्रतिशत रहा, जो 2019 के 37 दशमलव 3 प्रतिशत के मुकाबले मामूली कम था, लेकिन सीटें घटकर 240 रह गईं। हालांकि, मोदी ने टीडीपी और जेडीयू जैसे सहयोगियों के साथ तीसरी बार सरकार बनाई और यह साफ कर दिया कि वे अपनी शर्तों पर सरकार चला रहे हैं। लोकसभा चुनाव के बाद महाराष्ट्र, हरियाणा, दिल्ली, बिहार और पश्चिम बंगाल के चुनावों में पार्टी की जीत ने साबित किया कि मोदी का जादू बरकरार है। 2014 में भाजपा केवल 5 राज्यों में सत्ता में थी, लेकिन 2026 तक 21 राज्यों में भाजपा या एनडीए की सरकारें देश के लगभग 72 प्रतिशत हिस्से पर शासन कर रही हैं। मोदी ने भाजपा को विश्व की सबसे बड़ी सदस्य संख्या वाली पार्टी बनाया है और उसे हमेशा चुनावी मोड में रखा है। उन्होंने दूसरे दलों के नेताओं जैसे हेमंत विश्व सरमा, सम्राट चौधरी और शुभेंदु अधिकारी को भी पार्टी में महत्वपूर्ण स्थान दिया है और राजनीति के दांवपेंच में माहिर मोदी ने विपक्ष को पस्त करते हुए यह साबित किया है कि मोदी हैं तो सब मुमकिन है।

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