चारा घोटाला: लालू यादव को सुप्रीम कोर्ट से राहत, जमानत रद्द करने की याचिका खारिज
सुप्रीम कोर्ट ने देवघर चारा घोटाला मामले में राजद प्रमुख लालू प्रसाद यादव की जमानत रद्द करने से इनकार कर दिया है, जिससे उन्हें बड़ी कानूनी राहत मिली है।
राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के अध्यक्ष और बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव को देवघर चारा घोटाला मामले में न्यायपालिका से बड़ी राहत मिली है। देश की सर्वोच्च अदालत, सुप्रीम कोर्ट ने लालू यादव की जमानत को रद्द करने की केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) की याचिका को खारिज कर दिया है और सीबीआई ने चारा घोटाला मामले में दोषी ठहराए गए राजद सुप्रीमो की जमानत को चुनौती देते हुए उसे रद्द करने की मांग की थी। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वह लालू यादव को जमानत देने के हाई कोर्ट के पुराने आदेश में किसी भी प्रकार का हस्तक्षेप नहीं करना चाहता है।
सुप्रीम कोर्ट का रुख और महत्वपूर्ण टिप्पणी
मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई की मांग को ठुकराते हुए कई महत्वपूर्ण टिप्पणियां कीं। अदालत ने कहा कि वह हाई कोर्ट के फैसले में दखल देने का कोई ठोस आधार नहीं देखती है, विशेष रूप से इसलिए क्योंकि इस मामले को काफी समय बीत चुका है। कोर्ट ने संज्ञान लिया कि सीबीआई की यह अपील साल 2018 की है और तब से अब तक सात साल का लंबा समय गुजर चुका है। इतने वर्षों बाद जमानत रद्द करना अदालत को उचित नहीं लगा। इसके साथ ही, सुप्रीम कोर्ट ने निचली अदालत और हाई कोर्ट को निर्देश दिया है कि लालू यादव से जुड़े इस मामले की सुनवाई में तेजी लाई जाए ताकि न्याय प्रक्रिया को जल्द पूरा किया जा सके।
सीबीआई की दलीलें और विरोध
सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान सीबीआई की ओर से पेश हुए एडिशनल सॉलिसिटर जनरल (एएसजी) एसवी राजू ने अपनी दलीलें रखीं और उन्होंने अदालत को बताया कि लालू यादव की जमानत याचिका को पहले दो बार खारिज किया जा चुका था। एएसजी ने तर्क दिया कि हाई कोर्ट ने बाद में उन्हें इस आधार पर जमानत दे दी कि उन्होंने अपनी सजा का 50 प्रतिशत हिस्सा पूरा कर लिया है। सीबीआई का दावा है कि यह गणना तकनीकी रूप से गलत है। जांच एजेंसी के अनुसार, हाई कोर्ट ने इस तथ्य पर विचार नहीं किया कि लालू यादव को दी गई सजाएं एक साथ चलने वाली (कनकरेंट) नहीं थीं, बल्कि वे अलग-अलग थीं। इस आधार पर सीबीआई ने तर्क दिया कि आधी सजा पूरी होने का दावा गलत है और उनकी जमानत रद्द की जानी चाहिए।
क्या है चारा घोटाला और इसका इतिहास?
पीटीआई की रिपोर्ट के अनुसार, यह पूरा मामला बिहार के विभिन्न जिलों में सरकारी खजाने से धोखाधड़ी के जरिए सार्वजनिक धन की अवैध निकासी से जुड़ा है। चारा घोटाला पहली बार जनवरी 1996 में तब सुर्खियों में आया जब पशुपालन विभाग के विभिन्न ठिकानों पर छापेमारी की गई। इसके बाद जांच की कमान सीबीआई को सौंपी गई, जिसने जून 1997 में लालू प्रसाद यादव को एक मुख्य आरोपी के रूप में नामित किया। यह घोटाला कुल 950 करोड़ रुपये का है, जिसमें पशुओं के चारे, दवाओं और उपकरणों के नाम पर फर्जी बिलों के जरिए सरकारी पैसा निकाला गया था।
लालू यादव की भूमिका और वर्तमान स्थिति
राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव को 950 करोड़ रुपये के इस चारा घोटाले से जुड़े कुल पांच अलग-अलग मामलों में जेल की सजा सुनाई गई है। यह भ्रष्टाचार का खेल साल 1992 से 1995 के बीच खेला गया था। उस समय लालू यादव बिहार के मुख्यमंत्री थे और उनके पास वित्त विभाग के साथ-साथ पशुपालन विभाग का प्रभार भी था। यह वह दौर था जब बिहार का विभाजन नहीं हुआ था और झारखंड भी इसी राज्य का हिस्सा था। इस घोटाले में दोषी ठहराए जाने वाले वह सबसे प्रमुख राजनेताओं में से एक थे। वर्तमान में, लालू यादव अपने खराब स्वास्थ्य और बढ़ती उम्र से जुड़ी बीमारियों के आधार पर जमानत पर बाहर हैं। सुप्रीम कोर्ट के ताजा फैसले के बाद अब उनकी जमानत बरकरार रहेगी।
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