हॉकी वर्ल्ड कप 2026: 28 साल का सिलसिला टूटा, भारतीय अंपायरों को लगा बड़ा झटका

नीदरलैंड्स और बेल्जियम में होने वाले 2026 हॉकी वर्ल्ड कप के लिए किसी भी भारतीय अंपायर का चयन नहीं हुआ है, जो 28 साल में पहली बार हो रहा है।

Aug 7, 2026 - 17:35
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हॉकी वर्ल्ड कप 2026: 28 साल का सिलसिला टूटा, भारतीय अंपायरों को लगा बड़ा झटका

अंतरराष्ट्रीय हॉकी महासंघ (FIH) द्वारा आगामी पुरुष हॉकी वर्ल्ड कप 2026 के लिए अंपायरों और तकनीकी अधिकारियों के पैनल की घोषणा कर दी गई है, जिसमें भारत के लिए एक निराशाजनक खबर सामने आई है। 15 अगस्त से नीदरलैंड्स और बेल्जियम की संयुक्त मेजबानी में शुरू होने वाले इस महाकुंभ में कोई भी भारतीय अंपायर या टेक्निकल ऑफिशियल मैच का संचालन करता हुआ नजर नहीं आएगा। यह भारतीय हॉकी के लिए एक बड़ा झटका है क्योंकि 28 साल के लंबे इंतजार के बाद यह पहला मौका है जब वर्ल्ड कप के आधिकारिक पैनल में एक भी भारतीय चेहरा शामिल नहीं है।

1998 के बाद पहली बार ऐसी स्थिति

इतिहास पर नजर डालें तो साल 1998 में यूट्रेक्ट में खेले गए वर्ल्ड कप के बाद यह पहला अवसर है जब भारत का कोई भी प्रतिनिधि अंपायरिंग पैनल में जगह नहीं बना पाया है। पिछले 28 वर्षों से भारतीय अंपायर लगातार विश्व कप जैसे बड़े मंचों पर अपनी सेवाएं देते रहे हैं, लेकिन 2026 के लिए तैयार किए गए पैनल में यूरोपीय देशों के अंपायर्स का पूरी तरह से दबदबा दिखाई दे रहा है। अंतरराष्ट्रीय हॉकी फेडरेशन (FIH) की अंपायरिंग समिति आमतौर पर उन अधिकारियों का चयन करती है जो ओलंपिक, प्रो लीग और पिछले वर्ल्ड कप में लगातार उत्कृष्ट प्रदर्शन करते रहे हैं।

भारतीय हॉकी के दिग्गज अंपायरों का सफर

भारतीय हॉकी के आधुनिक युग में अब तक केवल चार पुरुष अंपायर ही वर्ल्ड कप के स्तर तक पहुंचने में सफल रहे हैं। इनमें अमरजीत सिंह बावा, तरलोक सिंह भुल्लर, सतविंदर शर्मा और आर वी रघु प्रसाद के नाम शामिल हैं। आर वी रघु प्रसाद ने तो 2010, 2014, 2018 और 2023 के वर्ल्ड कप में अंपायरिंग की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी निभाई है। पिछले साल अंतरराष्ट्रीय स्तर से संन्यास लेने वाले रघु प्रसाद 200 अंतरराष्ट्रीय मैचों में अंपायरिंग करने वाले पहले एशियाई अंपायर भी बने थे। उनके संन्यास के बाद भारतीय अंपायरिंग में एक बड़ा शून्य पैदा हो गया है।

एक्सपोजर और सुविधाओं की कमी पर चिंता

वर्ल्ड कप में अंपायरिंग कर चुके इन दिग्गजों ने आगामी टूर्नामेंट में भारतीय प्रतिनिधित्व न होने पर गहरी चिंता व्यक्त की है और दिग्गज अंपायर सतविंदर शर्मा ने इसे बेहद निराशाजनक बताया है। उन्होंने याद दिलाया कि जब 2008 के बीजिंग ओलंपिक में भारतीय पुरुष टीम क्वालीफाई नहीं कर पाई थी, तब भी वह अकेले अधिकारी के रूप में भारत का प्रतिनिधित्व कर रहे थे। शर्मा का मानना है कि जब तक घरेलू अंपायरों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नियमित मौके नहीं मिलेंगे, तब तक वे आधुनिक हॉकी की बारीकियों और मांगों को नहीं समझ पाएंगे। उन्होंने सुझाव दिया कि अंपायरों को नेशनल कोचिंग कैंपों का हिस्सा बनाया जाना चाहिए।

आर्थिक असुरक्षा और प्रोत्साहन का अभाव

अंपायरिंग के क्षेत्र में युवाओं की कमी का एक बड़ा कारण वित्तीय असुरक्षा और प्रोत्साहन की कमी है। अमरजीत सिंह बावा ने बताया कि उनके समय में घरेलू मैचों के लिए प्रतिदिन 20 रुपये से 100 रुपये तक का भत्ता मिलता था और अंपायरों को कोई विशेष सम्मान या मेडल नहीं दिया जाता था। सतविंदर शर्मा के अनुसार, आज भी कई भारतीय अंपायर या तो बेरोजगार हैं या केवल घरेलू मैचों तक ही सीमित हैं। आर वी रघु प्रसाद ने कहा कि खिलाड़ियों को पदक जीतने पर सरकारी नौकरियां और पुरस्कार मिलते हैं, लेकिन अंपायरों को न तो कोई निश्चित वेतन मिलता है और न ही कोई इंसेंटिव। नौकरीपेशा अंपायरों को अंतरराष्ट्रीय दौरों के लिए छुट्टियां मिलने में भी काफी कठिनाई होती है।

हॉकी इंडिया और अंपायरों के आंकड़े

हॉकी इंडिया की वर्तमान सूची के अनुसार, भारत में 100 से अधिक पुरुष और 70 से अधिक महिला अंपायर पंजीकृत हैं। हालांकि, जब बात एफआईएच (FIH) के एलीट पैनल की आती है, तो वहां केवल 6 भारतीय पुरुष और 4 महिलाएं ही शामिल हैं। रघु प्रसाद के संन्यास के बाद यह संख्या और भी कम हो गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि भारत को अगले वर्ल्ड कप या ओलंपिक में अपनी मौजूदगी दर्ज करानी है, तो अंपायरिंग के विकास के लिए एक ठोस रोडमैप तैयार करना अनिवार्य होगा।

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