मैरिटल रेप: केंद्र ने SC से कहा, अपराध घोषित करना संसद का काम
केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से कहा कि मैरिटल रेप को अपराध घोषित करना संसद का काम है। CJI सूर्य कांत की पीठ 3 हफ्ते बाद करेगी अंतिम सुनवाई।
भारत की केंद्र सरकार ने वैवाहिक बलात्कार (मैरिटल रेप) के संवेदनशील मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट के समक्ष अपना औपचारिक रुख स्पष्ट कर दिया है। बुधवार को हुई सुनवाई के दौरान, सरकार ने जोर देकर कहा कि वैवाहिक बलात्कार को एक आपराधिक कृत्य घोषित करने का निर्णय पूरी तरह से विधायिका और कार्यपालिका के अधिकार क्षेत्र में आता है, न कि न्यायपालिका के। यह दलील उस समय दी गई जब देश की सर्वोच्च अदालत वर्तमान भारतीय कानूनों के तहत पतियों को मिलने वाली कानूनी छूट की संवैधानिक वैधता की जांच करने की तैयारी कर रही है। केंद्र का मानना है कि इस तरह के नीतिगत बदलाव के लिए संसद की मंजूरी आवश्यक है।
सुप्रीम कोर्ट की पीठ और सुनवाई का कार्यक्रम
इस महत्वपूर्ण मामले की सुनवाई भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की तीन सदस्यीय पीठ द्वारा की गई और प्रारंभिक दलीलों को सुनने के बाद, सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि वैवाहिक बलात्कार को अपराध घोषित करने की मांग वाली याचिकाओं पर तीन हफ्ते बाद अंतिम सुनवाई शुरू की जाएगी। अदालत ने इस मामले को बुधवार और गुरुवार को अंतिम सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने का आदेश दिया है। यह समयसीमा सभी पक्षों को अपनी दलीलें तैयार करने का पर्याप्त अवसर प्रदान करती है ताकि इस जटिल कानूनी और सामाजिक मुद्दे पर विस्तार से चर्चा की जा सके।
कानूनी चुनौतियां और वैधानिक प्रावधान
सुप्रीम कोर्ट में दी गई यह चुनौती मुख्य रूप से भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 63 के अपवाद 2 पर केंद्रित है। यह प्रावधान पुराने भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 375 में मौजूद वैवाहिक बलात्कार से जुड़े अपवाद को ही आगे बढ़ाता है। इस कानून के अनुसार, यदि कोई पुरुष अपनी पत्नी के साथ यौन संबंध बनाता है या यौन क्रिया करता है, तो इसे बलात्कार नहीं माना जाएगा, बशर्ते पत्नी की उम्र 18 साल से कम न हो। केंद्र की ओर से पेश हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत में स्पष्ट किया कि इस अपवाद को हटाना या इसे अपराध की श्रेणी में लाना संसद का कार्य है।
अदालत की महत्वपूर्ण टिप्पणियां
सुनवाई के दौरान जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने महिलाओं की सुरक्षा और शारीरिक अखंडता को लेकर गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने टिप्पणी की कि शादी का मतलब किसी भी तरह से महिला की आजादी का खत्म होना नहीं हो सकता। जस्टिस बागची ने पूछा कि क्या राज्य ऐसी स्थिति को बलात्कार मानता है जहां एक महिला को उसकी मर्जी के बिना यौन संबंध बनाने के लिए मजबूर किया जाता है। उन्होंने कहा कि ऐसी महिला निश्चित रूप से एक पीड़ित है और अदालत का काम पीड़ितों की रक्षा करना है। अदालत इस बात पर विचार कर रही है कि क्या वैवाहिक बलात्कार को दी गई कानूनी छूट संविधान के सिद्धांतों के अनुरूप है या नहीं।
याचिकाकर्ताओं की दलीलें
याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश हुईं वरिष्ठ अधिवक्ता करुणा नंदी ने तर्क दिया कि वैवाहिक संबंध किसी भी व्यक्ति को अपनी पत्नी की मर्जी के खिलाफ यौन संबंध बनाने या उसे शारीरिक नुकसान पहुंचाने का अधिकार नहीं देते और उन्होंने कहा कि यदि कोई पति अपनी पत्नी को गंभीर चोट पहुंचाता है, तो वह केवल शादी के रिश्ते के आधार पर कानूनी छूट का दावा नहीं कर सकता। याचिकाकर्ताओं का मुख्य तर्क यह है कि यह छूट महिलाओं के समानता के अधिकार और गरिमा के साथ जीने के अधिकार का उल्लंघन करती है।
केंद्र सरकार का रुख और मामले की पृष्ठभूमि
केंद्र सरकार ने पहले भी अपने हलफनामे में कहा था कि वह वैवाहिक बलात्कार को एक अलग आपराधिक अपराध बनाने के पक्ष में नहीं है। सरकार का तर्क है कि इसे अपराध घोषित करने से विवाह की संस्था पर गंभीर असर पड़ सकता है और इससे वैवाहिक रिश्तों की स्थिरता प्रभावित हो सकती है। केंद्र ने यह भी सुझाव दिया कि शादी के भीतर यौन संबंधों से जुड़े विवादों को सामान्य बलात्कार के अपराध के बराबर मानने के बजाय मौजूदा अन्य कानूनी प्रावधानों के तहत सुलझाया जाना चाहिए। यह मामला सुप्रीम कोर्ट तब पहुंचा जब 2022 में दिल्ली हाई कोर्ट ने इस मुद्दे पर एक विभाजित फैसला सुनाया था, जिसमें दो न्यायाधीशों की राय अलग-अलग थी। अब सुप्रीम कोर्ट इस पर अंतिम निर्णय लेगा।
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